लड़की और लड़के के बीच के फरक। (Topic Started 18.12.19)

आज के नए युग में समाज के कुछ नए युवा सतंभ, जिनमें ज्यादातर समझा जा सकता है की फीमैलस हैं, फीमैलस को मेलस के बराबर साबित करके बड़ा सुख और आनंद और नया-पण महसूस करते हैं। लेकिन मैं कहता हूँ की सच यह है की जिन भी कल्चरस में फीमैल जितना ज्यादा मर्द के नीचे समझी जातीं हैं, उतना ही वो समाज और कल्चर शांती का जीवन जी रहे हैं।

इसकी शुरुआत कुदरत से ही हुई है। प्रकृति चाहती है की उसके बनाए गए मेलस और फीमैलस अलग अलग व्यवहार करें और अपना जीवन जिएं । इसी लिए प्रकृति सभी फीमैल में अलग कुदरती जूस एस्ट्रजन (estrogen) बनाती है, जबकि मेलस में टेस्टास्टरोन (testosterone hormones) पैदा करती है। और यह अलग हरमोन सारी उम्र दोनों को अलग अलग गुण और धर्म पैदा करने पर विवश करता जाता है। दोनों में अलग तरह की ही शक्तियाँ पनपती रहती हैं।

एक अन्य ऐसी उद्धरण ले लीजिए, जो इस पॉइंट को पूरी क्लेरिटी से दिखाता है, और जिसमें किसी मिश्रण या biased ऐन्सर की पासबिलिटी नहीं। लाइअनिस (फीमैल lion) अपने बच्चों की देख भाल करती है, उनको दूध आदि पिलाती है, या फ़िर हल्का फुल्का शिकार करती है। मुख्य बड़े शिकार मार कर लाने की, और कुनबे की रक्षा करने की पूरी जिम्मेदारी (मेल) lion की होती है। यानि औरत और मर्द के फरक कुदरत ने अपने जीनस के अंदर गहरे तक एम्बेड किए हुए हैं।
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लेकिन आज के टाइम, औरत को मर्द के बराबर दिखाने के चक्कर में वो अपनी आइडेंटिटी पूरी तरह से भूल जा रही है। और नई, मर्द वाली आइडेंटिटी उसमें पूरी तरह से कभी भी आ नहीं पाएगी। आखिर कुदरत से कौन जीत पाया है?
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और कुछ कानून की बेबकूफीयां भी जिक्र योग्य हैं।

  • कानून कहता है की दहेज देना या लेना मना है। जो की पिता अपनी दौलत का 10% भी न देता होगा। लेकिन वही कानून यह कहता है की उसको अपनी बेटी को अपनी दौलत का 50% (यानि बेटे के बराबर) देना ही होगा। अब बताईए, कानून का पालन न करके दहेज न लेकर जाने वाली बेटी कल को कानून का फ़िर से पालन करने पर आमादा हो गई तो समाज का क्या हाल होगा?

  • कानून सब को बराबर हक दिलाने के चक्कर में मंदिरों के नियमों में भी दखल देना शुरू कर चुका है। जो सदियों से बुजुर्गों ने परम्पराएं बनाई हैं, (बुजुर्ग, जो की आज के जजस से बहुत ज्यादा समझदार और दूरदर्शी थे), उनको बराबरी दिखाने के चक्कर में वो तोड़ने लगे हैं। आज शबरीमाला में वो औरतों को दाखिल करवाने में लगे हैं। कल को कहेंगे की औरत को माहवारी आई हो, तो भी वो मंदिर जा सकती है। और परसों वो डिसाइड करेंगे की क्यूंकी पेशाब भी पिया जा सकता है, तो मंदिर के अंदर पेशाब करना भी गलत नहीं।
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    और दूसरी तरफ, खुद को मर्द के बराबर कहने वाली औरतें, जब कुछ फायदे लेने की बात आती है, तो मर्द से अलग खड़ी होकर अपने औरत के फ़ायदे उठाने के लिए तयार बैठी मिलती हैं।

  • औरत मर्द को कोई गाली निकाल दे, उसको कोई सजा नहीं। लेकिन इसके उलट करके देखिए।

  • औरत को कोई मर्द गिरफ्तार नहीं कर सकता। लेकिन इसके उलट नहीं।

  • औरत को रात को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

  • औरत मर्द पर दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करवा सकती है, लेकिन मर्द नहीं।

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