जाति आधारित राजनीति को खत्म कर अच्छे राजनीतिक को अपना नेता चुने

क्या किसी डॉक्टर ने आपका सस्ता इलाज किया है क्योँकि आप उसकी जाति के हो । क्या किसी सरकारी कर्मचारी ने जाति के आधार पर आपके काम को जल्दी करने की कोशिश की है । क्या किसी दुकानदार ने आपकी जाति का होने कारण आपको चीजो का सस्ता दाम लगया है । नही ना । तो फिर आपको नेता आपकी जाति का ही क्योँ चाहिए

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सर जी, जाती, धर्म, समुदाय, की कहीं कोई बात नहीं है।
यह सबको मालूम है।

बात है तो बस अपने स्वार्थ की।
जब कोई बंदा किसी खास बंदे से जुड़कर खुद का फ़ायदा देखता है, तो उसको और किसी बात से मतलब नहीं।
अब आप देख लो, बहुत मुस्लिम बीजेपी को अपना दुश्मन मानते हैं। लेकिन फिर भी बहुत मुस्लिम लीडरस जिनको बीजेपी में अच्छी पहचान और रुतबा हासिल है, वो बीजेपी को मुस्लिम्स का पक्षधर मानते हैं।

ऐसे ही, बहुत से कट्टर सिख जाती के लोग, काँग्रेस को अपना दुश्मन मानते हैं, लेकिन जिस सिख को काँग्रेस में कोई पोस्ट/पद हासिल है, वो खुशी खुशी सोनिया गांधी को अपनी माँ कहता है। बहुत से ऐसे लीडर हैं।

दलित समुदाय में देख लो, बहुत से दलित जिनको अलग अलग पार्टी में जगह मिली हुई है, वो उसी पार्टी को आती पिछड़ों का सेवक मानते हैं।

यानि लबों लबाब यह है की किसी भी बंदे को किसी भी जाती समुदाय धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। सबको मालूम है की धर्म ने उसको उसका वो लालच पूरा नहीं करना जो वो चाहता है।

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Since Paswan has joined Bjp, he says Bjp is the single party, who truly wants to end poverty.

And dont’ think that public looks for his own jaati.
no sir, public only sees their own benefit. Although some times they think it wrong. Benefit is in one thing, but they are thinking it in another. But you can’ t say that they are thinking about their community.

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सर आप भटिंडा के रहने वाले है । एक आध अबसर को छोड़ कर क्या भटिंडा संसदीय सीट पर किसी भी प्रमुख पार्टी ने सिख को छोड़ कर किसी ओर धर्म समुदाय को टिकट दिया हो । ऐसे मैं बहुत से उदहारण दे सकता हूं । यहाँ राजनीतिक पार्टियां केवल जाति और धर्म के समीकरणों को देख कर ही टिकट देती है क्योँकि उनको पता है ज्यादातर लोगों का माइंडसेट जाति और धर्म पर ही टिका हुआ । और जिस जाति के ज्यादा आबादी होती है उसी अद्दार ओर टिकट दिया जाता है । इससे कोई भी राजनीतिक दल चाहे वह सी.पी.एम. ओर बीजेपी ही क्योँ न हो

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अब यह आपका पॉइंट बदल गया।
पहले आप जनता के बारे में कह रहे थे की जनता को जाती छोड़ कर देखना चाहिए।
और मैंने कहा था की जनता अपनी जाती के लीडर नहीं बल्कि अपने फायदे का लीडर देखती है।

और जहां तक पोलिटिकल पार्टीस का सवाल है, उनको लगता है की किसी खास जाती का टिकट देकर उस जाती के लोग उसको जीता देंगे। पर ऐसा है नहीं। लोग उसी को जिताते हैं, जिसमें उनको अपना फ़ायदा दिखता है।

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सर लोगो को फायदा अपनी जाति के बन्दे में ही ज्यादा नजर आता है अगर ऐसा न होता तो पार्टियां टिकट देने में जाति आधार देखना बंद कर देती । कुछ अपवाद होते है जिसमे लोग अपना फायदा पार्टी या उम्मीदवार से निजी सम्बद देख कर वोट करते है । इस मामले में ग्रामीण लोग शहरी लोगो से ज्यादा जातीय अद्दार पर अपना नेता चुनते है ओर जनरल जातियो से दलित भी
जातिय अद्दार पर अपना पक्ष बनाते है

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मुझे लगता है की यह अनैलिसिस करना बहुत मुश्किल है की जो कैनडिट जीते हैं, उनमें से कितना फ़ायदा जाती के कारण मिला है।
और जो हारे हैं, उनमें कितने जातीय वोट नहीं मिलने के कारण हारे हैं।

अगर ऐसा कोई सही अनैलिसिस हो पाए तो मुझे लगता है की यह पता चलेगा की जीतने और हारने में जाती का रोल 5% भी नहीं है। उनको बस लगता है की जाती जीता देगी। लेकिन ऐसा होता नहीं। 2000 से पहले भी नहीं होता था, और उसके बात अब 20 वर्षों में तो बिल्कुल ही हकीकत बदल चुकी है। लोग झण्डा कितना ही उठाई फिरें अपनी जाती का। जब वोट डालते हैं तो केवल अपना पर्सनल बेनेफिट देखते हैं और इसीलिए जातीय रजिनीति हार रही है।

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ਦਿਨ ਬ ਦਿਨ ਜਾਤਿ ਦੇ ਹਿਸਾਬ ਨਾਲ ਕੋਈ ਵੋਟ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦਾ।

ਜੇ ਕੁਛ ਹੋਣਗੇ ਵੀ ਤਾਂ ਓਹਨਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਘਟਦੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਬਹੁਤ ਜਿਆਦਾ ਘੱਟ ਚੁੱਕੀ ਹੈ।

ਪਿੰਡਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਲੋਕ ਬਹੁਤ ਪੜ੍ਹ ਗਏ ਅੱਗੇ ਨਾਲੋਂ। ਤੇ ਜੇਹੜੇ ਨਹੀਂ ਵੀ ਪੜੈ, ਓਹ ਵੀ ਕਹਿ ਕੁਛ ਵੀ ਜਾਣ । ਵੋਟ ਓਸਨੁ ਦਿੰਦੇ ਹੈ, ਜਿਹੜਾ ਓਹਨਾਂ ਦਾ ਵਯਂਕਤੀਗਤ ਫੇਦਾ ਕਰਦਾ ਹੈ।

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पर्सोनल बेनिफिट से मुझे आपका मीनिंग नही समझ आया । आपके अनुसार कितने लोग किसी सांसद से अपने निजी काम करवाते होंगे 15 लाख के लगभग वोटर में से ।

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निजी काम करवा पाना या न करवा पाना, वो अलग बात है।
लेकिन लोग जुड़ते निजी स्वार्थों की बजह से ही हैं।

मेरे जैसे बंदे को भी मेरे एक ख़ास दोस्त ने मनप्रीत बादल के लिए मना रखा था कि कल को मुझे कोई जरूरत पडी तो वह खड़ा है मेरे लिए।

यूँ ही आगे की आगे लोग प्रेशर ग्रुप्स बनाते रहते हैं।

जाती धर्म केवल दिखावा है।

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सर फिर तो आपके हिसाब से सब उमीदवारों या पार्टियों का जाति और धर्म के अनुसार वोटिंग पैटर्न एक जैसा रहता होगा । परंतु बास्तव में ऐसा नही है । अभी ताजा हरियाणा के चुनाब में यहां सभी जातियों के वोट मिले । परंतु जाट समुदाय ने बीजेपी को 10 प्रतिशत भी वोट नहो दिए । और जाट समुदाय ने अपना वोट पूरी तरह जाट नेता भूपिंदर हुडा तथा दुष्यंत चौटाला के पक्ष में दिया । 90 % यादव अपना वोट लालू तथा मुलायम को देते है । ज्यादातर दलित अपना वोट मायावती को देते है । जिस किसी प्रदेश में यदि कोई कास्ट डोमिनेट करती है तो उस जाति के ब्यक्ति अपनी जाति के किसी बढे नेता को ही वोट देना पसंद करते है । चौधरी अजित सिंह की रलोप केवल up के तीन जिलों तक ही सीमित है क

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मेरे पास ऐसा कोई डाटा तो नहीं है।

मैं बस यूं ही देखने में जो दिखाई देता है, लोगों से बातें आदि करके, वही बता रहा हूँ।
अगर आपके पास डाटा है, तो फिर आपकी बात सही होगी।

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bilkul galat

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jara 2019 ka election par gor karo is baar logo ne jaati dharam ke naam par vote nahi kiya hai

mai bhi ek sanghathan se juda hu jab ham jamin par gaye to is baar bohot kuch logo ne asi baate kahi jo pehle jin par koi baat tak nahi karta tha

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Good.

is baar nahi sir is baar logo ne bas ek he naam par vote kiya tha or vo hai nationalism
or aane vaale wakt mai ye or jada badhega
kyoki ham sab booth level par kaam karne waale log hai

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ਮੈਂ ਵੀ ਪੂਰਾ ਸਹਮਤ ਹਾਂ ਕੀ ਲੋਗ ਦਿਖਾਵੇ ਦੇ ਤੋਰ ਸੇ ਆਪਣੀ ਜਾਤ ਵਿਰਾਦਰੀ ਨਾਲ ਕਿੰਨਾ ਮਰਜੀ ਤੁਰੇ ਫਿਰਨ, ਪਰ ਜਦੋਂ ਵੋਟਾਂ ਦਾ ਸਵਾਲ ਓਂਦਾਂ ਹੈ ਤੋਂ ਫੱਟ ਓਸ ਬੰਦੇ ਨਾਲ ਜਾ ਖੜਦੇ ਹਨ ਜਿੱਥੇ ਓਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਵਦਾ ਵਯਂਕਤੀਗਤ ਫੇਦਾ ਦਿੱਖਦਾ ਹੈ।

ਜੇ ਓਹ ਹੋਨਸਲੇ ਵਾਲਾਂ ਬੰਦਾ ਹੋਏ ਤਾਂ ਖੁੱਲ ਕੇ ਉਸ ਲੀਡਰ ਦੇ ਨਾਲ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰਿ ਤਾਂ ਵੋਟ ਜਰੂਰ ਉਸਨੂੰ ਹੀ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਓਹਣੂ ਆਵਾਂਦਾ ਫੇਦਾ ਦਿੱਖਦਾ ਹੋਵੇ। ਜਾਤ ਵਿਰਦਾਰੀ ਕੀ ਕੋਈ ਢੋਓਈ ਵੀ ਨਈਂ ਮਾਰਦਾ।

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