रणजीत बावा को उस कोम के बहम क्यूँ दिखने लग गए, जिसको खुद उसके पुरखे बिलॉंग करते थे?

कोई पाथियाँ पथ रहे गाँव वासियों को कहे की गाय की टट्टी में हाथ क्यूँ मारी जा रहे हो? तो उसका क्या जबाब है?

#रंजीत बावा

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Ek dum sahi keha Jnaab ne :v::ok_hand:

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It’s a big thing to speak on this matter openly .
Salute to your courage sir.

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Thank you bhaiyo.

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very nice this proper logic…apne sahi kha hindu sikh alag nahi hai…but thode anjaane log alag krne ki koshish mai lge rehte…apke mureed ho gya hun…wah bobby g wah…

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@Rahul_Goyal
क्या आपको सभी बातें पसंद आईं?
कुछ बात जो और जुड़ सकती हो?

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Aapne ache andaaz me kahi sahi baate.

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Thanks bhai.

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I belong to a Hindu family but being a native of Punjab we are aware about the Sikh history as well & we are a regular Gurudwara going family & I’m proud of this thing. But there are some mischievous persons in both communities who don’t want this type of understanding between Hindus & Sikhs.
We are lacking in life just because of these types of persons.
It’s just a matter of tune out the other political issues like growth & development etc.

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:ok_hand: :ok_hand:

Kudos to this video … Is se achi explanation aur is se acha Society me peace laana wala message abhi tak toh Pure Facebook, WhatsApp par nahi dekha … jaha Sikh hindua ke faith ko Galat bol rhe hai aur Hindu Sikho ke faith ko … Par Factual baat koi nahi kar raha … Pyar ki baat koi nahi kar rha … Par Izzat sabko chaiye … !

Ranjit Bawa ne Maafi mang li par abhi b hamare sikh bhai Usko support karne ka hashtag de rhe hai ki I support Ranjit Bawa etc … Matlab hum jaa kaha rhe hai ??

Par hope aise video se kuch Fanatics samjhe pyar aur faith ki bhavna ko aur dusro ke faith ke baare me apni naak Naa adaye … Kyunki Case karwa dena koi hal nahi hai ! Last time b aisa hi kuch Sidhu moosewala ke song ka saath hua tab hum sab ekjut huye ki Singer ne Mai Bhago baare kuch galat kaha … fir Guru Granth Sahab Beadabi hui fir b hum sab saath the … fir Nankana Sahib Khola gya tab b saath the Par Ayodhya time par b kuch Fanatics baaz nahi aa rhe the …

Matlab Hum Logon ne toh kabhi koi question nahi kia kisi b faith se related cheez par Unke Orthodox ideology wale bande Sab cheezo ko questions kar rhe hai Hindu Religion ki … Aisa toh nahi peace ho sakta Sir Ji. . Is liye Hum sabhi ko ekjut hokar chalna chaiye irrespective of Faith, Creed, Religion … nahi aane wale time me kisi Political angle me fas apna hi nuksaan karwa baithenge sabhi log.

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Very true

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बह अछे जनाब…सच तो येह है कि कोई इतना ज्ञानी या स्याना नहीं कि दूसरे के धर्म को बुरा कह सके, यह हो सकता है कि कोई चीज़ धर्म की समझ न आये, पर कोई इतना स्याना नही को उससे बुरा कह सके । अगर किसी धर्म को बुरा कहता है तो खुद की बेफकूफियत दिखा रहा है।

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रंजीत बावा के मुद्दे पर मेरे द्वारा डाले गए विडिओ पर सेकड़ों कमेन्ट तो आ रहे हैं, लेकिन विडिओ काल पर डिस्कस करने के लिए कोई तयार नहीं हो रहा था। लेकिन फाइनली, मेरे साथ डिस्कशन करने का, एक मोने बंदे, योग ट्रैनर मंदीप सिंह, ने अंत में फोन पर मेरे से डिस्कस करने होंसला निकाल ही लिया।

उसके साथ आज 10 मई, 2020 की सुबह, करीब 25 मिनट की मेरी बात यहाँ पर या यहाँ पर सुन/डाउनलोड कर सकते हैं आप।

पहले वो बंदा मेरे उलट था, लेकिन बातचीत के बाद, अब उसने अपने उन्ही कमेन्ट के नीचे मेरी तारीफ करने वाला छोटा सा कमेन्ट भी डाला है। और कहा है की उसने वो विडिओ ही नहीं देखा, जिसको अब यूट्यूब से हटा कर (उन्ही बोलों के ऊपर) दूसरा विडिओ डाल दिया गया है। विडिओ देखने से पहले अब वो मेरे खिलाफ नहीं बोल सकता है।

#टॉक
#बातचीत
#टेलीफोन पर
#yog
#teacher
#योग
#टीचर
#मंदीप

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कुछ लोग दूसरों की रस्मों पर उंगली उठाया कर बड़ा आनंदित होते हैं। रंजीत बावा वो पंक्तियाँ कहना भूल गए, की बुरा जो देख्न मैं चला, बुरा न मिलय कोई, जो घर देखा आपना, उससे बुरा न कोय।
हालांकि उनको अच्छी तरह से पता है की सब धर्मों समुदायों में कुछ ऐसी बातें प्रचलित हैं जो उस वक्त सही थीं, लेकिन आज वो समय वाहक हो गई हैं। As today you’ve made Yesterday a lie, so will tomorrow do to you. जैसे आज तुम कल को झुटलाने पर तुले हो। कल तुम्हारे आज को झुटला देगा। जब यह रस्में शुरू की गई थीं, तब उनका महत्व और था, आज और है। जिस भी समुदाय से वो खुद हैं, उनमें भी होंगी। जो मैं आगे बताता हूँ।
पहली बात, पगड़ी धारी सिख लोग जिनको अपने गुरु मानता है, वो सभी गुरु हिन्दू थे। 10 के 10. वो सभी हिन्दू देवी देवताओं को मानते थे। उनकी प्रशंसा में जगह जगह दोहे आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में सेकड़ों बार भगवान राम का नाम आया है, हरी नारायण का नाम आया है, देवी पार्वती, शिव भगवान का नाम आया है, हरिमंदिर साहब का नाम हरी नारायण भगवन के नाम पर रखा गया था।।

खुद गुरुओं के माता पिता उन्ही देवी देवताओं के नाम के ऊपर अपने बच्चों, जो बाद में जाकर गुरु बने, के नाम रखते आए हैं। त्रेता युग में रामायण काल में बाली के पुत्र अंगद के नाम पर दूसरे गुरु का नाम अंगदेव रखा गया थे। चौथे गुरु को भगवान राम के नाम पर श्री रामदास जी कहा गया। पाँचवे गुरु जी को द्वापर काल में पांचों पांडवों में से सबसे ज्यादा मशहूर पांडव अर्जुन के नाम पर श्री अर्जुन देव जी कहा गया। फिर गोविंद तो सभी को पता है की भगवान कृष्ण के कई नामों में से एक मशरूर और बहुत उपयुक्त होने वाला नाम है, गुरु ग्रंथ सभी के बहुत दोहों में आता है। तो आठवें और दसवे गुरुओं के नाम गोविंद पर रखे गए। और सब के पीछे बहादुर, देव, राय, आदि लगाया गया।

और जब मुस्लिम राजायों ने हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ा दिए, तो फिर गुरु गोबिन्द राय, जो उस वक्त तक राय ही थे, ने 1699 में सिख पंथ की नीव रखी, और खुद को व अपनी फौज को ‘सिंह’ नाम दिया। क्या वो हिंदुओं की रक्षा के लिए नहीं रखी थी?
अब वही खालसा पंथ उस बात का कुछ बेनेफिट लेने को कहें की हुमने हिंदुओं की रक्षा की, इस बात का बार बार जिक्र करो। और हो सके तो उसका कोई बेनेफिट दो।

तो यह तो बेकार की बात है। फिर कल को मराठा कोम कहेगी की हुमने बहुत शाहीदियाँ दी। हमें कुछ एक्स्ट्रा दो। या पहचानो। या कल को भगत सिंह की फॅमिली कहे की जट प्रविराओं, जो सिर्फ उस समुदाय को कुछ एक्स्ट्रा दो जो पगड़ी बांधते हैं। या फिर राजपूत कहें? की हम भी सिंह लगते हैं अपने नाम के पिछे, पगड़ी भी बांधते हैं, हुमने भी तुम्हारे से भी अधिक लड़ाईयां लड़ी, कुर्बानियाँ दीं। तुमने तो हिंदुओं में से कुछ बहादुर चुन कर खलसे बनाए, हमारी पूरी जाती ही बहादूरों की रही है। ऐसए कैसे चलेगा? सबने अपने अपने काम किए। सबने एक दूसरे की रक्षा की। अगर कोई हिन्दू खालसा फौजी बन कर लड़ने गया मुस्लिम राजयों से, तो पीछे उसके परिवार को उस परिवार ने सहारा दिया, जो लड़ने नहीं गया।
पहले पंज प्यारे, दया राम, धर्मदास, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिब चंद सभी अलग अलग जातियो के थे। सभी अपनी अपनी जाती के हिसाब से उसका सिला मांगेंगे तो क्या होगा? छज अपना और छालनी अपना हिस्सा मांगने लग गई तो?

आज भी देख लीजिए, अकेले ग्रंथ साहिब में हिन्दू समुदाय की मान्यताओं वाले देवी देवता ही नहीं, बल्कि जैसे हिन्दू जनएयू पहनते थे, गुरु जी ने अपनी फौज को गातरा पहनने को बोल। और उस वक्त की लदायियों के हिसाब से उसमें किरपन हमेशा साथ रखने को बोल। और उसी वक्त के हिसाब से बोल की अपने बालों को सवार कर मत रखो और उनको बढ़ाओ। लेकिन कंघी साथ में रखो। कड़ा जो लड़ाई में तलवार के वार को रोकता है, वो हमेशा पहनो। और अगर तुमने नीचे कच्छा पहना हुआ है, तो काफी है। लेकिन आज के वक्त ने उन चीजों की जरूरत और अहमियत को कम कर दिया। लेकिन जो पक्के अमृत धारी सिख हैं, वो उनको पाँच ककारों के नाम से उनकी इज्जत करते हैं और जो मोने बंदे हैं, दाड़ी केस नहीं रखते। उनको वो तुच्छ समझने लग गए। अब कोई मोना बंदा जो पगड़ी न पहनता हो, उन पांचों का मजाक उड़ाये की यह तो बहम है, तो उसका कोई मीनिंग नहीं। क्यूंकी उस वक्त वो वक्त की जरूरत और उपयुक्त रहे होंगे, लेकिन आज कुछ लोगों की श्रद्धा का विषय बने हुए हैं।
ऐसए ही हिंदुओं ने उस वक्त जनेऊ धरण करवाया, उस वक्त उसकी कोई जरूरत रही होगी। जो भी धरनाएं बनाई गईं थी, लेकिन आज के वक्त वो बेमानी हो गई हैं। लेकिन कुछ समुदाय उनको पूरी शरदा से देखता है। तो जिसने मजाक उड़ान है, वो उड़ा सकता है। क्यूंकी आज लॉजिक न तो गातरा पहनने वाले के पास है, न ही जनऊ पहनने वाले के पास। कोई तो कहता है की मैं चाहे एक चोटी सी किरपान, बिल्कुल 1 इंच की चिन्ह के रूप में रखनी है, कोई कहता है की मैं पूरी तलवार ही किरपान के तोर पर रखूँगा। यह अब गातरा, या जनेऊ पहनने वाले ने सोचना है। की कितना बड़े साइज़ का गातरा या जनऊ पहनना है। यह उसकी खुद की श्रद्धा है।

सिख और हिन्दू में तो और भी बहुत मेल हैं। जैसे हिंदुओं के मंदिर, के गुंबद होते थे। तो गुरु गोबिन्द सिंह के टाइम गुरु द्वारे जो बनाए गए, उसमें भी वही गुंबद बनाए गए। मंदिरों में तालाब होते थे, तो गुरु द्वारों में भी रखे गए। माता के मंदिर को दरबार कहा गया, तो किसी भले मानस ने सोच की हार्मिन्दर साहब को भी हम लोग दरबार ही कहा करेंगे, तो उन्होंने उसका नाम हरमंदिर से दरबार कर दिया। अब कोई कहए की नहीं हिन्दू और सिख अलग अलग हैं, तो मैं कहूँगा की वो ऐसा जहर घोलने की कोशिश कर रहा है जो घोलते घोलते भिंडरवाले को अपनी जान देनी पड़ी। लेकिन वो पगड़ी धारी और मोने बंदे को अलग नहीं कर पाएगा।

और अब आ जाईए आप मूत्र पीने पर। पहली बात तो खुद का मूत्र पीना विज्ञानिक ढंग से बहुत ज्यादा फ़ायदा करता है। और गए का मूत्र पीना तो बहुत ही लाभ दायक है। इसमें हिन्दू वाली कोई बात नहीं। गाय के सब तरह के बेनेफिट सभी समुदाय लेते हैं। गाँव में गाय को घर का मेम्बर मानते हैं। पगड़ी बांधने वाले भी, और मोने भी। इसका दूध भएन्स के दूध से ज्यादा उपयोगी है। इसका गोबर या उसकी सुगंध बैक्टीरीअ आदि भगाने के लिए अधिक उपयोगी है।
इसकी खाद भएन्स की खाद से ज्यादा उपयोगी है। अब कल को रंजीत बाबा जैसा बंदा आए, और कहए की यार गए की टटियाँ लिपि जा रहे हो। और उधर गरीब मार रहे हैं।
अब अगर कोई गायक इन चीजों को गलत बताई जाएगा, तो फिर वो गायक या उसको सुनने वाले, हो सकता है कल को, यह भी कहदें की चोट लगने पर मोने लोग तो हल्दी पीते हैं। या सर दुखने पर कपूर की डली खाते हैं। इतना कपूर या इतनी हल्दी वो दान ही कर दें। फिर इन बातों का कोई इलाज नहीं। सारा आयुर्वेद ही इन चीजों पर खड़ा है। सारी पर्शियन दवाएं, हकीम लुकमान, जिसके नाम पर कहावत तक बन गई की बहम का इलाज तो लुकमान के पास भी नहीं था, वो हकीम लुकमान सारी इसी तरह की अजीब अजीब जड़ी बूटियों से ही इलाज करता था। किसी में ऊंट का मूत्र, तो किसी में गाय का, या भहकरे का। अब कल को कोई गायक कहए की यार यह लोग तो भकरा ही खाए जा रहे हैं। तो उस गायक को इलाज की जरूरत है, आम पब्लिक को नहीं। कतो कुछ लोगों के कहने से कुछ नहीं होता। जो चीज सेवा करने से फ़ायदा देती है, वो सच ही रहेगा। कवों के बैठने से बनेरे ठहते तो पता नहीं क्या हो जाता।

तो अंत में, कहना चाहूँगा की हरेक धर्म में ऐसी बातें हैं, जिनका आज कोई मीनिंग नहीं रहा।
लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो कुछ भोले बंदों को आडंबर लगती हैं, लेकिन उनके पीछे आज भी विज्ञानिक कारण छिपे हुए हैं।
और अंत में, जैसे गायक कहत है की दूध पत्थर पर चढ़ाने की बजाय दान कर दो। मुझे यकीन है की जितने लोग दानी हैं, खुद वो उसका आधा भी दान नहीं करता होगा। लेकिन शिक्षा दूसरों को देते हैं की यह प्रथा गलत है और ऐसा कर लो।

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लेकिन क्या हमें उन पर रेयकट करना चाहिए, या नहीं?
यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इसके दो पहलू हैं। एक तो यह है की अगर मुझे कोई नशेड़ी कहता है, तो मुझे गुस्सा तो ही लगेगा अगर उसकी बात में थोड़ी सी सच्चाहई होगी। अगर मुझे कोई लँगरा कहए, और मैं सचमच थोड़ा लँगरा कर चलता हूँ, तो ही मुझे गुस्सा लगेगा। अगर मैं नहीं हूँ तो मुझे कितना भी लँगरा, या नशेड़ी कहए, मुझे उसकी मूर्खता पर हँसी तो आएगी, लेकिन क्यूंकी मुझे मालूम है की मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं हूँ, वो कितना भी ढिंढोरा क्यूँ न पिटे , लोग उसी को मूर्ख कहेंगे।
लेकिन दूसरी और बात यह भी है की, बार बार दोहराया झूठ भी सच लगने लग जाता है। a oft-repeated lie is equal to truth.
त इसलिए जो लोग गाने में गिनाए गए काम करते हैं तो उनको गुस्सा आएगा ही, चाहे उनको लगे की वो झूठ बोल रहा है और बार बार बोल गया झूठ कहीं सच न दिखने लग जाए। या फिर चाहे वो कहीं न कहीं खुद के कार्यों को बहम मानते हैं।

मछली ने पानी से कहा की तुम्हें मेरे आँसू नहीं दिखते, क्यूंकी मैं तुम्हारे अंदर हूँ। तो पानी ने मछली को जबाब दिया की मैं तुमहरे आँसू फ़ील कर सकता हूँ, क्यूंकी मैं तुम्हारे अंदर हूँ। तो दोस्तों कुदरत कुछ इसी तरीके से हमारे अंदर, हमारी ज़िंदगियों के अंदर घुसी हुई है की उसको कोई माई का लाल अलग नहीं कर सकता है।

लेकिन फिर भी, कुछ लोग, या किसान, जिस जानवर को पहले परिवार के मेम्बर की तरह समझते हैं, उससे प्यार देते और लेते हैं। और वो भी एक माँ की तरह अपना सब कुछ तुम्हें दे देता है। फिर वो अपने माँ समान उस पशु का, का फ़ायदा उठा कर, बूढ़ी या फुनडेर हो चुकी गाय को सड़कों पर उनको मरने कटने के लिए क्यूँ छोड़ देते हो? जबकि कानूनन कोई बंदा एक छोटा सी रेत की ढेरी भी, अपने खुद के घर के बाहर भी नहीं छोड़ सकता। तो फिर गाय जिसका बूढ़ी होने के बाद भी, उसका पेशाब, गोबर उनके मरने के दिन तक बिकता है। तो फिर उसका दूध खत्म होने के बाद, तुम उसको सहरों की सड़कों पर मरने मारने के लिए क्यूँ और कैसे छोड़ आते हो? क्या तुम 1-2 टोकरे तुड़ी के नहीं डाल सकते यार? इतना ज्यादा स्वार्थ जाग चुका है? हनलंकी किसान का यही स्वार्थ किसान को कंगाल कर चुका है। जिन गायों को लोग जबरदस्ती अमानवीय हालातों में बूचड़खानों तक ले जाते हैं, और फिर उन्ही अमानवीय तरीकों से काट देते हैं, तो उन बेजूबानों का श्राप लगता है आपको। या जब वो खुद एक्सीडेंट में कुर्बान हो जाती हैं और उनके साथ किसी की माँ, किसी का बाप, या किसी का जवान बेटा उसके सामने मर जाता है, तो उनकी हाय लगती है आपको। वरना यूं ही नहीं कंगाल हुए आप। गायों का झुंड अगर कुछ महीने किसी बंजर जमीन पर खड़े खड़े अपना गोबर करता रहे, तो वो बंजर जमीन भी हरी हो जाती है। जबकि भएन्स से ऐसा नहीं होता। सोचिए कैसे ज्ञानी रहे होंगे हमारे पुरखे जो उन्होंने यह चीजें शुरू में ही पहचानीं?

पहले के जमाने में थोड़ी सी महनत करते थे, तो किसान के कोठे भरे रहते थे। अब वो टीके लगा लगा कर जानवरों को पागल कर चुका है। दवाईयां फेंक फेंक कर जमीनों को बंजर, और लोगों को कैंसर से भर चुका है। फिर भी उसके खुद घर में खुशाली नहीं आई, गायब हो गई है। क्यूँ?
अरे, अगर मोने गाय का बचाव करना छोड़ भी दें। लेकिन क्या किसान लोग अपने मित्र जानवरों के बिना, जी पाएंगे?

और इधर, 10 के 10 गुरु भगवान गोविंद के भजन गाते रहे। उनके दोहे गाते रहे। पार्वती माँ, शिव भगवान की तारीफ में लिखते रहे। और आज कुछ लोग कहते हैं की वो हरी नारायण कोई और थे, गोविंद कोई और थे, कृशन कोई और थे जो ग्रंथ साहिब में महिमा मंडित किए गए हैं, वो कोई और थे? आज कुछ लोग कहते हैं की जो सिख पंथ से जुड़े जो डेरे गायियों को हरा डालते हैं, वो हमारी मर्यादा से बाहर हो गए? कौन हो वो कुछ लोग? क्यूँ हर समुदाय में यह कुछ लोग दो भाईयों को अलग अलग माँ बाप के पुत्र साबित करने में लगे हुए हैं? पगड़ी धारी और मोने, एक ही धारा से निकले 2 सगे भाई हैं। लेकिन कुछ लोगों को लगता है की यह कायर भाई है, जो जान भूजह कर बहादुर भाई को ज्यादा ही भाई भाई पुकारता है। लेकिन जिस दिन यह कायर भाई ने पुकारना छोड़ दिया, उस दिन देखना इस बहादुर भाई की हालत दुनिया में क्या रह जाएगी।
-------7. रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए, टूटे तो फिर जुड़े नहीं, जुड़े तो गांठ पड़ जाए। भिंडरवाले ने गांठ तो डाल दी है। अब बिल्कुल अलग मत करो। याद रखना, जो बेटा अपने माँ बाप से अलग होने को पहले दोड़ता है, क्या कभी तुमने देखा है की वो अपनी जॉइन्ट फॅमिली से अधिक तरक्की कर गया हो? कभी भी नहीं। और फिर वो यह कम्प्लैन्ट करते फिरते हैं की माँ बाप ने हिस्से में ही उनको कम दिया।

लेकिन कुछ लोगों का स्वार्थ इन दोनों को अलग करके टुकड़े करके, और फिर एक छोटे से भूमि के टुकड़े का हीरो बनना ही मकसद है उनका।
उनको कैसे कैसे अलग करते हैं यह बात मुझे कल एक टेलीफोन काल पर बठिंडा के योग टीचर संदीप सिंह, जो मोने-सिख फॅमिली से हैं शायद, ने बताई है। बठिंडा के किले वाले गुरुद्वारे में चनों का भोग मिलता था 10-15 वर्ष पहले तक, लेकिन sgpc को लगा की यह तो हिंदुओं की रीत है, और इससे हिन्दू सिख एक लगने लग जाते हैं। तो वो कहते की बंद करो हिंदुओं की तरह चना बनाना, कराह प्रसाद बनाया करो। क्या है ये?

— And now some idiots, who try to compare apples with oranges, or honey with butter, जो गुरुओं की, भगवान गोविंद कृष्ण के गाय प्यार को भूल कर, कहते हैं की अगर गाय माता है तो बैल को पिता बना लो। ऐसे ही कुछ लोग कहने लगेंगे की कच्छे की जगह पेंट को रख लो। रख लेंगे हम? नहीं रख सकते। जो पाँच ककरों में कच्छे की जगह है, वो कच्छे की रहेगी। वे हमारे लिए श्रद्धा का विषय हैं, तर्क का नहीं। जो गाय की जगह है वो गाय की रहेगी। न बैल, गाय की जगह ले सकता है, न पेंट, कच्छे की। इन चीजों का जान भूजह कर मजाक उड़ाने वाले को समझ की कमी है।

और अब कुछ मोने लोगों की बेबकोऑफ़ियाँ। भाई, अगर गाय माँ की जगह है। और उसका दूध, उसका गोबर उसका पेशाब सब काम में आता है, तो इसका मतलब यह नहीं है की कल को कोई गाय के गोबर को टट्टी कहे तो तुम उसके पीछे लठ लेकर पड़ जाओ। बात को गाय तक ही रहने दो। उसको बढ़ाओ मत। जैसे कुछ लोग ग्रंथ साहिब को पूजते पूजते एरोप्लेन की उन सीटस को भी पूजने लग गए, जिस सीट पर रख कर ग्रंथ साहिब को रख कर इंडिया से usa ले जाएगा गया। अपनी श्रद्धा को बेबकूफी की सीमा में मत ले जाओ भाई।
गाय का पेशाब तो दवा का काम करता है। 100% सही है। मैं खुद पीता हूँ। देश के पीएम मोरार जी देसाई, इतनी ऊंची सोच के मालिक अपना खुद का पेशाब पीते थे, न ही कोई यह छिपाने वाली बात है, न ही कोई छिपाता है। खुले आम बिकता है। पूरा बिजनस है इसका। 100 तरह की पेट की बीमारियों को ठीक करता है। तर्क शक्ति को बढ़ाता है। गाय का दूध दिमाग को पेना करता है, जबकि भएन्स का दूध दिमाग को मोटा करता है, सबको मालूम है। जहां तक की जो मुस्लिम गाय को काटते हैं, वो भी यह सविकार करते हैं की भएन्स का दूध शारीरक और दिमागी दोनों तरह की चर्बी को बढ़ाता है और गाय का दूध दोनों तरह की चर्बी को कम करता है।
लेकिन अगर यह बीमारियाँ ठीक करता है, तो इसको दवा ही तो मानो। श्रद्धा का रूप क्यूँ देते हो? और कोई बंदा इस पर बेबकूफी भरा गीत गा भी देता है, तो तुम अगर इस बात पर उसके पीछे पड़ गए तो तुम उससे भी बड़े बेबकूफ़ हो। फिर तो यह हुआ की तुम पीना भी चाहते हो, और कहलवाना भी नहीं चाहते कि तुम पीते हो? तो इसका मतलब तुम्हें पीते हुए शर्म आती है। तो फिर पीते ही क्यूँ हो? ऐसा काम करते ही क्यूँ हो जो तुम्हें चोरी छिपे करना पड़े? कल को कोई बंदा डिस्परिन की गोली पर गीत गा दे की यह फलानी कोम तो डिस्परिन की गोली खाने वाली कॉम है। क्या तब भी तुम उसके यूं ही पीछे पड़ जाओगे?
– Please, Persist in what must be done, at the same time, resist in what must not be done.

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अरे भाई, हो सकता है डिस्परिन की गोली ने उसका दिमाग हिला दिया हो। पेशाब ने उसके किसी प्रिय जन को पागल कर दिया हो। तो वो तो पेशाब को कोसेगा ही? तुम क्यूँ और किस अधिकार से उसके पीछे पड़ोगे? कौन स कानून कहता है की कोई बंदा किसी दवा को कोस नहीं सकता? और अगर तुम कहते हो की वो दवा नहीं है, गाय की तरह ही पूजनीय है, फिर तुम और गूढ मूर्खता की और बढ़ रहे हो, जैसे की ग्रंथ साहिब जिस प्लेन पर रख कर ले जाए गए, उसको पूजने वाला बढ़ रहा है। और ध्यान देना, ऐसा वही बंदा करेगा, जिसको उसके अंदर लिखीं शिक्षा समझ में नहीं आती हैं, वो उसको कभी भी समझ नहीं आई होंगी।
– जिसको किताब समझ में नहीं आई तो वो फिर किताब की जिल्द को ही तो पूजेगा।

अंत में, जो भी समुदाय, चाहे पगड़ी धारी, चाहे मोने, जो तुम्हारी श्रद्धा बन चुके हैं, उनेमिन से कई चीजें तुम्हारे गुरुयों देवी देवताओं ने चाहा भी नहीं था, लेकिन तुमने उनको पकड़ लिया। जैसे मूर्तियों को भोजन खिलाने की, सुलाने की प्रथा, या निशान साहिब को भी पूजने की प्रथा। लेकिन चलो, बना लिया। लेकिन भाई, इन चीजों को और मत बढ़ाओ। उलटे इनको कम करने की कोशिश करो। और इनके पीछे जो असली शिक्षा थी। जो शकसीयत थीं, जो मकसद थे, उन पर चलने की चेष्टा करो।

कई kttad लोग कमेन्ट करते हैं की मैं इस बात पर उनको शिक्षा क्यूँ दे रहा हूँ? तो भाई बात यह है की तुम्हारी बढ़ती बेबकोऑफ़ियाँ, हम पर भी असर डालने लग गईं। हम जो कटड़ नही भी बनना चाहते, उनके जीवन भी इन बातों के कारण डिस्टर्ब हो रहे हैं। अगर सार्थक बातें नहीं हैं करने को, तो निरर्थक करनी जरूरी तो नहीं हैं?

और जो लोग समझते हैं की सच में कर्म कांड से निकलना चाहिए, तर्क पर चलना चाहिए, उनको मैं कहूँगा की अगर वो मोने हैं तो पहले अपने खुद के कर्म कांड से निकलें। और अगर वो पगड़ी धारी हैं और समझते हैं की उनके समुदाय में कोई कर्म कांड नहीं हैं तो नेवजेलण्ड का हार्नेक सिंह का रेडियो सुन लें। जो तर्क पर, सबूत के साथ हजारों गलतियाँ साबित कर चुका है इस समुदाय में।

और बावे जैसे बंदे के लिए यह संदेश है की पंजाब में आज वो वक़्त बन चुका है भाई, की तुम यदि तुम किसी समुदाय की कमी निकालना चाह रहे हो, और तुम दिल से सच्चे भी हो, वो सच में बहम भ्रम ही हैं, लेकिन इसके बाबजऊद, तुम्हें उसके बराबर की ही कमी अपने खुद के समुदाय में भी निकालनी होगी। अगर तुमने चालाकी से, या अपनी कम अक्ली की बजह से, पलड़ा जरा स भी एक समुदाय की और ज्यादा झुका दिया, तो शुक्रिया भिंडरवाले का, जिसने अपने स्वार्थ के चलते, मनों में इतने से तो फरक पैदा हो ही गए हैं, की वो एक समुदाय छड़ी लेकर तुम्हारे पीछे पड़ ही जाएगा। अगर तुममें इतनी समझ नहीं है की बिल्कुल बराबर तोल सको, तो फिर किसी भी समुदाय की कमी पब्लिक्ली निकालना बंद करना ही पड़ेगा तुम्हें।
Don’t bite more than you can chew.
क्यूंकी अब, 1980 से पहले वाले दिन नहीं रहे।

हैलो बठिंडा!