1984 में दिल्ली के कत्ले आम की बजह क्या थी?

लेकिन क्या कोई यह नहीं समझना चाहता है की वो हुआ क्यूँ?

मान लो, हमारा लड़का किसी की लड़की छेड़ कर घर आ जाये, और वो लोग लड़के की टांग बाह तोड़ दें, और हम उनकी लड़की को जान से मार दें, और उनके घर को आग लगा दें, और वो बदले में हमारी फॅमिली का ही कत्ल कर दें।

तो क्या एंड पर सिर्फ उनकी इस बात का ही जिक्र होगा की उन्होने हमारी फॅमिली कत्ल कर दी?
क्या उसके पीछे नहीं जाएंगे? की ऐसा हुआ क्यूँ?

ऐसा ही कुछ दिल्ली कत्ले आम का है।
वो सिख समुदाय का कत्ले आम क्यूँ हुआ?

क्यूंकी दो सिखों ने देश और खुद की कोम पर दाग लगते हुए देश की पीएम का क़त्ल कर दिया।
और उन दोनों ने ऐसा किया क्यूँ?

क्यूंकी इन्दिरा गांधी ने हरमंदिर साहब पर आर्मी रैड कारवाई थी।

आर्मी रैड क्यूँ कारवाई?

क्यूंकी भिंडरवाले ने उसको अपना किला बना रखा था। और वहाँ हथयारों का जखीरा जमा हो चुका था, जो दिन ब दिन बढ़ रहा था। और येही नहीं, उस वक़्त 1984 में, पंजाब में हिन्दू समुदाय के बंदे चुन चुन कर मारे जा रहे दे और भिंडरवाला देश को तोड़कर अलग से एक राज्य (जिसका उसने नाम भी सोच रखा था- खालिस्तान) की माँग कर रहा था।

ऐसा क्यूँ हुआ? क्यूँ भिंडरवाला ऐसा कर रहा था?
क्यूंकी काँग्रेस को अकालीस के खिलाफ एक मोहरा चाहिए था।
और भिंडरवाला पहले तो वो मोहरा बनने को तयार हो गया, फिर बाद में उसको खुद ही पावर का मज़ा आने लग गया।

तो फिर जब इतने कारण हैं, तो फिर उसमें से सिर्फ 1 को बाहर निकाल कर डिसकस करने का क्या मतलब हुआ? उस कत्ले आम में सभी कोमो के लोग मरे।
शुरुआत हिंदुस से हुई, और खात्मा सिख समुदाय से हुआ।

किसी एक बात का जिक्र अधूरा है, अधूरा ही रहेगा।

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और कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

1984 के बाद, पंजाब में केपीएस गिल आया, और उसने सारे उगर वादी, चुन चुन कर खत्म किया और पंजाब ने आराम की सांस ली।

लेकिन इन्दिरा और भिंडरवाले की उस मिली भगत ने, पंजाब में हमेशा के लिए हिन्दू और सिख, जो उस वक़्त से पहले तक एक थे, अलग अलग कर दिये।

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हैलो बठिंडा!